दुनिया में लोग रोटी के टुकड़े के लिये दोस्त बन जाते हैं। सच्चे दिल से प्रेम करने वाला कोई दोस्त दिखाई नहीं देता। रोटी के टुक़डे के लिये दर-बदर भागने वाले कुत्ते बहुत हैं। वे दोस्त होने का दावा तो करते है मगर उनकी दोस्ती में सच्चे दोस्त वाली निशानी नहीं हैं।
दुनिया खुदगर्ज लोगों से भरी पड़ी है। लोग दिखावा तो बफादारी और दोस्ती का करते है मगर उनके अन्दर स्वार्थ भरा हुआ है। लोग लालच के शिकार हैं। जहाँ से लालच के पूरा होने की पूरी उम्मीद होती है, वहाँ कुत्तो की तरह बैशर्मी से पूँछ हिलाते हुए दौड़े चले जाते हैं। जहाँ मर मिटने की बात होती है और त्याग की जरूरत होती है, वहाँ से दुम दबाकर भाग जाते हैं।
दुनिया न कभी सुखों का घर बनी हैं, न ही बन सकती है। दुनिया वह मुगतृष्णा हैं जिसके पीछे भागते-भागते मनमूर्ख लोग अपनी जान गवा बैठे है। दुनिया अधुरी और नाशवान है। इसके सुख भी अधुरे और नाशवान है। वह प्रभु पूर्ण अमर और अविनाशी हैं। केवल उसके मिलाप से ही सच्चा सुख मिल सकता है। इन्सान को इन्द्रियो के भोगों से मुँह मोड़कर प्रभु से नाता जोड़ना चाहिये। इन्द्रियो के भोग कभी आत्मिक शान्ति का स्थान नहीं ले सकते। आत्मिक शान्ति का एकमात्र स्त्रोत प्रभु का प्रेम और प्रभु का मिलाप हैं। इन्द्रियो के भोग इन्सान के सबसे बड़े दुश्मन हैं क्योकि ये इन्सान को सच्चे आत्मिक आनन्द से दूर रखते हैं।