आप बुद्रिमान हो। स्वतंत्र चिंतक बनो। अपने बुद्रिहीन मानना अपराघ है। अपने को बुद्रिहीन मानने वाला जीवन भर बुद्रिहीन बना रहता और आगे-से-आगे बिधड़ता जाता है, क्योकि वह स्वतंत्र चिन्तन नहीं करता।
बुद्रिमान स्वतंत्र चिंतक होता है। वह अध्यात्म सही स्वरुप को भली-भांति समज सकता और अध्यात्म के पथ पर चल शकता है।
जो व्यक्ति संस्कारो की जेल में बंदी बना है, उसके लिए अध्यात्म के सही पथ पर चलना दरकिनार रहा, अध्यात्म के सही स्वरुप को समझना भी संभव नहीं होता। स्वतंत्र चिन्तन को प्राथमिकता देना हितकर है। उसे प्राथमिकता देने से उसका क्रमिक-विकास और जीवन का पथ अदभुत-रुप से आवोकित होता है।
स्वयं का निर्णयक स्वयं बनने से जीवन मैं एक नई क्रांति घटित हो सकती है। विशेषतः अध्यात्मि रे संबंघ मे भले औरों को सुनो पढ़ो किन्तु अपने स्वतंत्र चिन्तन पर किसी को हावी मत होने दो। किसी के समर्थन और विरोध में जाने की अपेक्षा नहीं। अपेक्षा हैं केवल सच्चाई के उद्धाटन में दत्तचित बने रहने की। देरसवेर अवश्य उसका उद्धाटन होगा।
अपने स्वतंत्र-चिंतन से जीवन की बीमारी स्वयं खोजो और उसकी चिकित्सा में जुट पड़ो। अनंत जन्म व्यर्थ गंवाए-इस अनुपात को ओझल होने दो। जीवन के लिए वह कर गुजरना हैं फिर कुछ करना न पड़े।
तनाव या तनावग्रस्त जीवन का नाम व्यवहार है। अतनाव या तनाव शुन्य अनुभुति का नाम अध्यात्म है मैं हूँ-यह मन का एक बुदबुदा है, तनाव है। जब तक यह बुदबुदा मन में उठता और विलीन होता रहेगा तब तक जीवन तनाव पूर्ण रहेगा।
मैं धनवान या बुद्रिमान हूँ, मैं मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या राष्टपति हूँ। मैं अध्यक्ष, उपकुलपति या किलपति हूँ। मैं सम्यकवि. साघु. शास्त्रज्ञ या आचार्य हूँ। यह अच्छा बुरा ऐसा या वैसा है।
ये सब मन में उठने वाले बुदबुदे तनाव के जनक हैं। जब तक मन चंचल है तब तक मन के सागर ये बुदबुदे उठते रहेंगे और जीवन तनाव पूर्ण रहेगा। मन शांत होने पर इन बुदबुदों का उठना अवरुद्र हो जाता हैं और जीव तनावव मुफ्त बन जाता है।
जहाँ मैं और हूँ है वहीं तनाव है। जहाँ मैं और हूँ नहीं, केवल हैं हैं, वहाँ तनाव मुक्ति हैं।